इस देश को जरुरत है ऐसे हेमराजों की

अभिषेक साहू
जयपुर नेमो लिंक

लोग ऊँची शिक्षा पाकर महलों और बंगलों में रहने के सपने देखते हैं. अपने पैसे से और पैसे कमाने के सपने देखते हैं और दिन रात उसके लिए मेहनत करते हैं. लेकिन बहुत कम लोग हेमराज जी की तरह होते हैं जो यह मानते हैं कि जीना तो उसी का जीना है जो मिटना वतन पे जाने.

राजस्थान के जयपुर शहर के हेमराज चतुर्वेदी ने बायो साइंस से बी एस सी और फिर एम् एस सी करने के बाद झुग्गी झोपड़ियों में जाकर काम करने का रास्ता चुना. लोग अपने पैसे से और पैसा बनाते हैं लेकिन इन्होने अपना सब कुछ लोगों की जिंदगियों को संवारने में लुटा दिया और फिर भी अपने को सबसे अमीर लोगों में गिनते हैं.

हेमराज अपनी पहली पहचान एक पुरोहित के रूप में बताते हैं और ये शहर की झुग्गी झोपडी में रहने वाले बच्चों और उनके माता पिता को भी पढ़ाने के काम में जुटे हुए हैं.

इस एक घटना ने बदली हेमराज और सैकड़ो की जिंदगी

बात 2003 की है, हेमराज अपने काम पर जा रहे थे उस समय उन्होंने सड़क पर एक औरत को बेहोश पड़े देखा. उस पर किसी का ध्यान नहीं गया था शायद या फिर लोग उसे सोई हुई समझ कर निकलते जा रहे थे. इन्हे लगा कि शायद इसकी तबियत ठीक ना हो, यह सोच कर वे इसे एस एम् एस स्पताल ले गए. वहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया और बताया कि पिछले कुछ दिनों से कुछ खाना नहीं मिलने की वजह से उसकी मौत हो गई है.

यह सुनकर हेमराज का मन दहल गया और वे भावनाओं पर काबू नहीं रख सके और वहीं फूट फूट कर रो पड़े. उनके मन में यह विचार बहुत गहरे चला गया कि जयपुर जैसे मेट्रोपोलिटन शहर में भी खाना ना मिलने से किसी व्यक्ति की मौत हो सकती है.

बस वहीं से उन्होंने ठान लिया कि वे हर जरुरतमंद और भूखे को वे खाना मुहैया कराएंगे हेमराज ने अपने साथियों के साथ मिलकर “अन्न क्षेत्र” खोला जो लोगों को खाना प्रदान करता था. यहां से उन्होंने लोगों की जिंदगियां बदलने का काम शुरू कर दिया.

“अन्न क्षेत्र” से शिक्षा क्षेत्र एवं नशा मुक्ति क्षेत्र बना लिया

हेमराज शुरू से ही अपनी भावनाओं से संचालित होने वाले इंसानों में रहे हैं. अन्न क्षेत्र खोलने के बाद हेमराज ने कई झुग्गियों में दौरे करने शुरू किये और वहां उन्होंने ऐसा दृश्य देखा जिससे उन्हें कुछ और भी करने की प्रेरणा मिली.

उन्होंने देखा कि छोटे छोटे बच्चे रोटी कमाने के लिए जानलेवा स्टंट कर रहे हैं. तब उन्होंने सोचना शुरू किया कि वे कैसे इसे बदल सकते हैं. तब उन्हें लगा कि सिर्फ खाना दे देने से या रूपये दान कर देने से इनकी जिंदगी नहीं बदलने वाली है.

तब उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर इनको शिक्षा देने की ठानी. वे अपने पांच साथियों के साथ मिलकर, जिनमे फर्नीचर व्यवसायी अनिल कुमार, HDFC बैंक में मैनेजर के पद पर कार्य कर रहे विष्णु विमल, चंद्रकांत जो एक इंजीनियर हैं और अपने रिश्तेदार मनीष चातृवेदी के साथ अपनी अर्धांगिनी रेखा चतुर्वेदी को लेकर इनकी जिंदगी बदलने निकल पड़े.

इन्होने इन साथियों के साथ मिलकर एक समिति बनायीं और मुफ्त शिक्षा प्रदान करने के अभियान में जुट गए. वे इन बच्चों को शिक्षा के अलावा पुस्तकें और कपडे भी उपलब्ध कराते हैं. इसी दौरान उन्होंने नोटिस किया कि नशा भी एक बहुत बड़ा कारण है इन लोगों की प्रगति में तब फिर उन्होंने शिक्षा अभियान के साथ नशा मुक्ति अभियान शुरू कर दिया.

संकल्प दिला कर छुड़ाते हैं नशा

हेमराज की संस्था ह्यूमन लाइफ फाउंडेशन का मुख्य अभियान जरूरतमंद बच्चों को मुफ्त शिक्षा प्रदान करना है. इसमें वे बच्चों को प्राइमरी से लेकर क्लास तीन तक की शिक्षा देते हैं. उनका दूसरा मिशन एक नशा मुक्त सोसाइटी बनाना भी हैं.

वे झोपड़ियों में जाकर प्रोजेक्टर के जरिये फिल्मे दिखाते हैं और डॉक्टरों को साथ लेकर नशा करने के नुक्सान और छोड़ने के लाभ लोगों तक पहुंचाते हैं. एक पुरोहित होने के लाभ वे इस तरह लेते हैं कि वे स्वयं यज्ञ करते हैं और लोगों को नशा छोड़ने का संकल्प दिलाते हैं वे सीधे सीधे लोगों से पूछते हैं की वे मानवता को क्या दे सकते हैं.

कुल 650 बच्चो को भेज चुके हैं स्कूल

 

हेमराज चतुर्वेदी की संस्था अब तक कुल 650 बच्चों को सरकारी एवं प्राइवेट स्कूल भेज चुकी है. वे बताते हैं कि बच्चे अब सिर्फ सर्वाइव करने की नहीं बल्कि अब कुछ बनने की आशा रखते हैं.

पैसे नहीं थे तो अपने जीवन की पूंजी ही लगा डाली

हेमराज जी शुरू में तो कई लोगों से मिलकर तथा कॉलेज मे जाकर फण्ड इकठ्ठा करके यह सब शुरू करने का प्रयास किया. लेकिन पर्याप्त राशि नहीं हो पायी तो विचार करने के बाद उन्होंने अपनी और अपनी पत्नी की जीवन भर की पूंजी इस कार्य में लगा डाली.

अभी हाल ही में उनकी संस्था ने एक योजना आरम्भ की है जिसमे एक व्यक्ति 6000 रुपये देकर किसी एक बच्चे को गोद ले सकता हैं. इस राशि से उस बच्चे की साल भर की पढ़ाई तो हो ही जाती है, उसे कंप्यूटर ट्रेनिंग भी दी जाती है.

सरकार से मदद न मिली तो अपनी ही ज़मीन दे डाली

हेमराज ने नशा मुक्ति अभियान को और प्रभावशाली बनाने के लिए नशा मुक्ति केंद्र खोने की सोची और कई सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटे. लेकिन जब यहां भी कुछ होता नहीं दिखा तो तो उन्होंने अपनी ही ज़मीन पर नशा मुक्ति केंद्र बनवा दिया.

अब इससे भी एक कदम आगे जाकर वे अब अपने परिवार से रुपये लेकर और साथ ही बैंक से लोन लेकर उसी ज़मीन पर अनाथालय बनवा रहे हैं.

सबसे बड़ी ताकत है इच्छा शक्ति

हेमराज जी कहते हैं कि कई बार लोग उन्हें सुनने का समय नहीं देते. यहां तक कि बैठने को जगह नहीं देते. लेकिन वे सोचते हैं कि यह उनका नजरिया हो सकता है. इसके चलते हम अपने नजरिये को क्यों बदलें.

अपनी पत्नी को मानते हैं प्रोत्साहन का कारण

हेमराज बताते हैं कि चुनौतियां सैकड़ो हैं और मुसीबतें हजारो लेकिन उनके पास एक ऐसा हथियार हैं जो किसी भी मुश्किल को हरा सकता हैं. और वह है उनकी पत्नी रेखा चतुर्वेदी जो उनके साथ उनके अभियान में शादी के बाद से जुड़ी हुई हैं. रेखा ने बीएससी (सोशल साइंस) किया हैं और साथ ही एक बेटे और बेटी की माँ भी हैं

न्यूज़ मोर्चा उनके, उनकी पत्नी के और उनके साथियों के जज्बे को झुक कर सलाम करता है. इस देश को ऐसे एक नहीं, कई हेमराजों की जरुरत है. ऐसे हेमराज ही देश की तकदीर बदल देने का माद्दा रखते हैं.

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