राखी और दीपक जैसे लोगों के आसरे चलती है उसकी सरकार

अंजली सिंह
नेमो इंदौर ब्यूरो

सन 2006 में दिव्यांग बच्चों की सहायता हेतु इंदौर में एक शिविर लगा था और शिविर तक बच्चों की ज़रूरत का सभी सामान पहुचाने की ज़िम्मेदारी राखी फड़नीस पर डाली गई थी. राखी जी सामान लेकर जा ही रही थीं कि रास्ते में ही उनका एक्सीडेंट हो गया और जब सबको एक्सीडेंट के बारे में पता चला तो शिविर में मौजूद सभी सदस्य दिव्यांग बच्चों के साथ ही हॉस्पिटल पहुँच गए और शिविर वहीं लगा.

सभी बच्चे अपनी खुद की हालत भूल राखी जी के लिए प्रार्थना करने लगे. वे कहती हैं कि इन बच्चों की प्रार्थना का ही असर था कि इस भयंकर दुर्घटना के बाद भी वे बच गईं और डेढ़ साल बाद वो फिर से उठ खड़ी हो पाईं. लेकिन उन्हें शायद पता नहीं कि वे इसलिए बचीं कि ऊपर वाले की सरकार भी रेखा और दीपक फड़नीस जैसे महामानवों के आसरे चलती है, उन्हें तो बचना ही बचना था.

यह अलग बात है कि उनकी इस संस्था का नाम भी ‘आसरा’ ही है.

ऐसे हुई शुरुआत

सन 2000 से राखी फड़नीस ने दिव्यांगों की सहायता के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया था और आज इन्होंने इसके लगभग हर क्षेत्र में प्रशिक्षण ले लिया है. एक समय ऐसा भी आया जब उनकी APCID की पोस्ट सरकार ने यह कहकर छीन ली थी कि उन्हें अब दिव्यांगता के क्षेत्र में प्रशिक्षित कर्मचारियों की आवश्यकता नहीं है, सरकार के इस फैसले से आहत लगभग 51 जिले के कर्मचारियों ने न्यायपालिका की शरण भी ली थी. न्यायालय से न्याय मिलने के बाद सभी कर्मचारी बहाल किये गए.

जिनके इरादों में जान होती है

लेकिन जिसके अंदर कुछ कर गुजरने का माद्दा होता है वो सरकार या किसी और के आसरे नहीं बैठता है. जब तक न्यायालय का फैसला आता तब तक राखी फड़नीस ‘आसरा’ की नींव डाल चुकी थीं. नौकरी पर लौटने की स्थिति में उन्होंने अपने पति दीपक फड़नीस से कहा कि वे आसरा का कार्यभार संभाल लें जो आज भी संभाल रहे हैं.

कोई फर्क नहीं पड़ता

इस संस्था की शुरुआत उन्होंने अपने पति दीपक फड़नीस के साथ सन 2013 में की. वर्तमान में आसरा में 26 दिव्यांग बच्चे आश्रित हैं, जिनका पूरा खर्च राखी और उनके पति उठा रहे हैं तथा कई बच्चे दैनिक रूप से यहाँ के छात्र हैं. हाल ही में सरकार ने आसरा को घरौंदा परियोजना के लिए चुना है, जिसके अंतर्गत सरकार ने ₹10000 प्रति दिव्यांग बच्चा जो गरीबी रेखा के नीचे है, देने का निश्चय किया है. लेकिन अभी तक इस सरकारी सहायता का कुछ अता-पता नहीं है. परन्तु आसरा संस्था की उपाध्यक्ष श्रीमती भारती बनवड़ीकर का पूर्ण सहयोग संस्था को प्राप्त है.

यहां से चलता है आसरा

वर्तमान में आसरा इंदौर में एक सर्व सुविधाजनक मकान में संचालित होता है जो बाहर से देखने में किसी भी सामान्य घर जैसा ही दिखता है लेकिन अंदर नज़ारा अलग ही होता है. यहां बड़े उत्साह से कुछ अलग और कुछ खास बच्चे आपका स्वागत करते हैं. नौकरी की वजह से राखी जी सुबह व शाम को आसरा में अपना पूरा समय बच्चों के साथ व्यतीत करती हैं और बाकी समय इनके पति दीपक फड़नीस आसरा में बच्चों की देखभाल के लिए मौजूद रहते हैं.

उनकी यह पूरी कोशिश है कि दिव्यांगों के प्रति लोगों की मानसिकता बदले और इसकी शुरुआत उस परिवार से हो जहाँ ऐसे बच्चे जन्म लेते हैं क्योंकि जब तक बच्चे का परिवार ही सामान्य बच्चों जैसी व्यव्हार नहीं करेगा तब तक दूसरों से कैसे उम्मीद की जा सकती है. वे चाहती हैं कि कम से कम सक्षम लोग उनकी सहायता के लिए आगे आएं जिससे कि वो इन बच्चों का जीवन बेहतर बना पाएँ.

सुनिए सरकार

हम उनके इन प्रयासों के लिए सिर्फ और सिर्फ ‘आमीन’ कह सकते हैं और दोनों सरकारों से प्रार्थना कर सकते हैं कि दिव्यांगों को आसरा देने वाली इस संस्था की ऐसी मदद कीजिये कि इन्हे इन दिव्यांगों को आसरा देने के लिए किसी और के आसरे की जरुरत न पड़े.

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