सरकारी चपरासी की नौकरी के आगे कुर्बान है इंजीनियरी और वकालती

पिछले दिनों राजस्थान असेंबली के सेक्रेटेरिएट में चपरासी के 18 पदों के लिए बहाली हुई. इसके लिए 18,000 से ज्यादा आवेदन मिले. ये अलग बात है कि इंटरव्यू देने आए 12,453 लोग. इनमें से 129 इंजीनियर थे, 23 वकील थे, एक सीए था और 393 लोगों के पास पोस्ट ग्रैजुएट डिग्री थी.

दिलचस्प बात ये है कि 15 दिसंबर को जब फाइनल रिजल्ट आया तो एक सीट एक बीजेपी विधायक के बेटे को मिल गई, जो कि 10वीं पास है.

इससे भी दिलचस्प बात यह है कि चपरासी की नौकरी में दौड़ लगाईं इंजीनयर, वकील और चार्टर्ड अकाउंटेंट के साथ एमए पास लोगों ने और बाजी मार गया एक विधायक का दसवीं पास बेटा.

2016 में उत्तर प्रदेश में करीब 3,000 स्वीपर की भर्ती प्रक्रिया शुरू हुई तो वहां भी 1 लाख 10 हजार अर्जियां मिलीं और उनमें भी एम. टेक और एमबीए जैसी डिग्रियों वाले लोगों की अर्जियां मिलीं. सवाल उठता है कि ऐसा क्या है कि सरकारी चपरासी की नौकरी के सामने लोग अपनी इंजीनियरी, वकालत और सीए जैसी डिग्रियों को कुर्बान करने आ जाते हैं.

दरअसल सरकारी नौकरी को लेकर लोगों के मन में कई गलतफहमियां हैं. लोगों का मानना है कि सरकारी नौकरी में काम नहीं के बराबर होता है भले तनख्वाह जितनी हो.

दूसरा यह कि सरकारी नौकरी मिलना भले मुश्किल हो, जाने के खतरे बिलकुल नहीं के बराबर होते हैं. और सबसे बड़ी बात यह कि ऊपरी कमाई तो पक्की ही पक्की. फिर भले चपरासी की नौकरी ही क्यों न हो.

लेकिन समय अब बदल रहा है. अब सरकारी नौकरियां भी करार पर दी जाने लगी हैं और सरकारी नौकरियों में भी टार्गेट पर जोर दिया जा रहा है. सरकारी नौकरी की सुरक्षा कम हो रही है.

एक सच्चाई यह भी है कि देश में बेरोजगारों की बड़ी लंबी फौज तैयार हो गई है. यूएन लेबर रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में भारत में 1.77 करोड़ युवा बेरोजगार थे, जबकि 2017 में युवा बेरोजगारों की संख्या 1.8 करोड़ तक रहने का अनुमान है. 2017-18 में बेरोजगारी दर 3.4 फीसदी रहने का अनुमान है. देश की 65 फीसदी आबादी 35 से कम उम्र की है और वर्क फोर्स में सालाना 1 करोड़ की वृद्धि हो रही है. माना जा रहा है कि सरकार राष्ट्रीय रोजगार नीति ला सकती है और बजट 2018 में विस्तृत नीति संभव है.

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