इंदिरा कैंटीन है फायदे की जगह, लोगों और कांग्रेस के लिए भी

राहुल रॉय
नेमो बैंगलोर ब्यूरो

पांच रूपये में भरपेट और स्वादिष्ट भोजन मिल जाए और वह भी साफ़ सुथरी कैंटीन में तो भला कौन नहीं जाकर खाना चाहेगा इस जगह पर.

कर्नाटक के बैंगलोर शहर में शुरू हुई इंदिरा कैंटीन जितना फायदे का सौदा लोगों के लिए हैं उतना ही कांग्रेस के लिए भी.

राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी की सरकार ने हाल में राजधानी बेंगलुरु में इंदिरा कैंटीन की शुरुआत की थी. यह कैंटीन हर रोज़ 2 लाख से अधिक लोगों को सस्ता खाना मुहैया कराती है. ये ऐसी जगह है जहां सुबह होते ही भारी भीड़ इकट्ठा होने लगती है.

शहर की इंदिरा कैंटीनों में साढ़े सात बजे दरवाज़ा खुलता है और भीड़ अंदर चली आती है. थोड़ी देर की धक्का-मुक्की के बाद लोग लाइन में लग जाते हैं. लाइन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगती है.

टोकन लेकर और फिर खाना लेकर लोग अपनी पीली थाली लेकर कमरे के अंदर ही किसी टेबल पर या फिर खाना खाने परिसर के बाहर चले जाते हैं.

सबसे ख़ास बात यह कि खाना गर्म, ताज़ा और स्वादिष्ट होता है और सबसे ख़ास बात यह कि हर पकवान का दाम सिर्फ पांच रूपये.

अम्मा कैंटीन से मिली प्रेरणा

16 अगस्त को जब यह कैंटीन खुली तब इसका नाम भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नाम पर रखा गया था. ज़ाहिर है यह विचार तमिलनाडु की अम्मा कैंटीन से उधार लिया गया है.

तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने लोगों को सस्ता खाना देने के लिए अम्मा कैंटीन की शुरुआत की थी.

अम्मा कैंटीन में भी अच्छा खाना मिलता है लेकिन इंदिरा कैंटीन का खाना उससे भी अच्छा है.

इन कैंटीन के उपभोक्ता ख़ासकर के ग़रीब होते हैं. इनमें दिहाड़ी मज़दूर, ड्राइवर, सुरक्षाकर्मी और भीख मांगने वाले ऐसे लोग भी होते हैं जो दिन में कुछ सौ रुपये या कुछ भी नहीं कमाते हैं. जिनके लिए एक-एक पैसे की क़ीमत है.

सिक्यॉरिटी गार्ड के तौर पर काम करने वाले अशरफ भाई कहते हैं कि वह लगातार इंदिरा कैंटीन ही आते हैं.

वह कहते हैं, “खाना बहुत अच्छा है. इससे पहले मैं एक नज़दीकी रेस्त्रां में नाश्ता करता था जिसके लिए मुझे 30 रुपये देने पड़ते थे. अब मैं 25 रुपये बचा रहा हूं. यह अच्छी बात है और इस योजना को पूरे राज्य में लागू करना चाहिए.”

एक स्कूल के बाहर फल बेचने वाली लक्ष्मी कहती हैं कि कैंटीन के कारण उन्हें सुबह-सुबह नाश्ता बनाने की मेहनत से आज़ादी मिल गई है.

वह कहती हैं, “सुबह में अब मुझे काफ़ी समय तक खाना बनाने की ज़रूरत नहीं है. इससे मेरी ज़िंदगी आसान हो गई है. यहां खाना सस्ता है जिसे में ख़रीद सकती हूं और जो अच्छा भी है.”

सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ?

कैंटीन के नज़दीक ही एक लॉज में रहने वाले मोहन सिंह तीनों वक़्त का खाना यहीं खाते हैं. उनका कहना है, “मैं तीनों वक्त के खाने पर 40 रुपये ख़र्च करता हूं.”

मोहन कहते हैं कि बाहर खाना बहुत महंगा है और इससे पहले वह एक दिन में खाने पर 140 रुपये ख़र्च करते थे.

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इस तरह की कैंटीन सरकारी ख़ज़ाने पर बोझ है, लेकिन नेताओं ने इसे प्रसिद्ध बना दिया है क्योंकि इस देश में करोड़ों लोग एक दिन में एक डॉलर से कम पर गुज़ारा करते हैं.

कई विश्लेषकों का कहना है कि पिछले चुनाव में जयललिता के जीतने का मुख्य कारण अम्मा कैंटीन ही था.

कर्नाटक में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इस कैंटीन को स्थापित करने का फ़ैसला राजनीतिक ज़रूर हो, लेकिन अधिकारी इसका मक़सद परोपकार बता रहे हैं.

पूरे राज्य में कैंटीन खोलने की योजना

इस प्रॉजेक्ट के आधिकारिक इंचार्ज का कहना है कि हमारे मुख्यमंत्री साहब ने ग़रीबों को खाना खिलाने का फ़ैसला किया है. बहुत ज्यादा सोचते हैं वे गरीबों के बारे में.

वह कहते हैं, “इस कैंटीन का लक्ष्य प्रवासी आबादी, ड्राइवरों, विद्यार्थियों और काम करने वाले जोड़ों को खाना खिलाना है जिनके पास खाना बनाने के लिए कम समय होता है, लेकिन यह हर किसी के लिए खुली है.”

खाना एक जगह पर बनता है

आज़ादी की 70वीं सालगिरह के अगले दिन 16 अगस्त को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने बेंगलुरु आकर इस कैंटीन का उद्घाटन किया.

आज शहर में 180 कैंटीन हैं जो 2 लाख लोगों को खाना देती हैं.

हालांकि इस योजना को जनवरी तक पूरे राज्य में लागू करने की बात कही जा रही है जिसके तहत 300 से अधिक कैंटीन खुलेंगी. लेकिन इस बारे में अभी तक कोई ऐलान नहीं हुआ है.

एक प्रसिद्ध कहावत है कि लोगों के दिलों तक पहुंचने का रास्ता पेट से जाता है. कांग्रेस पार्टी को उम्मीद है कि चुनाव के समय वह ज़रूर जीतेगी लोगों को खिला ‘पिला’ कर.

लोगों को डर है

लोगों में डर है कि अगर सरकार बदली तो यह कैंटीन बंद हो जाएगी.

लेकिन कुछ लोग यह भी मानते हैं कि नागरिक केंद्रित योजनाएं जारी रहेंगी, सरकार कौन बनाता है इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

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