संघ संग चले चलो…बढे चलो, बढे चलो

नेमो नेशनल

समाज के उपेक्षित, दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग को मुख्य धारा में लाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक कार्ययोजना तैयार कर ली है. संघ ही वह संगठन है जिसने हमेशा देश में सामाजिक समरसता की बात की है.

यहां यह उल्लेख करना जरुरी होगा कि संघ ने आजादी से पहले ही हर गांव में एक कुआं, एक मंदिर और एक श्मशान की बात की थी. संघ उपनाम या सरनेम का भी पक्षधर नहीं है.

इस कार्ययोजना के तहत संघ प्रमुख मोहन भगवत से लेकर कार्यकर्ता स्तर तक इस प्रयास में जुट गए हैं.

हालांकि देश का एक मीडिया वर्ग इसे संघ की भाजपा को जिताने की चुनाव पूर्व तैयारी बता रहा है और इस मीडिया वर्ग में देशी से ज्यादा विदेशी मीडिया शामिल है.

ये है जर्मन मीडिया

जर्मनी का मीडिया डीडब्लू डॉट कॉम लिखता है कि गुजरात विधानसभा के चुनाव नतीजों ने संघ को सकते में ला दिया है, क्योंकि गुजरात में दलित, उपेक्षित और पिछड़ा वर्ग जिस तरह से कांग्रेस की तरफ खिसका है, उससे संघ को इस बात का अंदेशा होने लगा है कि अगर लोकसभा चुनाव में भी यही हुआ, तो सत्ता में भाजपा की वापसी आसान नहीं होगी.

वह लिखता है कि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए भले ही एक वर्ष का वक्त शेष हो, मगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भारतीय जनता पार्टी की जीत के लिए चुनावी बिसात पर चालें चलना शुरू कर दी हैं.

इस मीडिया ने संघ प्रमुख मोहन भगवत की अपने उदबोधन के दौरान कही बातों को अलग अर्थों में पेश करने की कोशिश भी की है. यह पोर्टल लिखती है कि प्रदेश के लगातार प्रवास कर रहे संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इशारों-इशारों में विदिशा में एकात्म यात्रा के दौरान इस बात का जिक्र भी कर दिया कि ‘अब समाज के उस वर्ग को करीब लाना होगा जो हमसे दूर है.’

सच्चाई यह है

यहां उल्लेख करना जरुरी होगा कि इस एकात्म यात्रा में श्री भागवत ने यात्रा में शामिल लोगों से कहा था कि ‘वे इस मकर संक्रांति से अगले साल की मकर संक्रांति के लिए समाज के उस वर्ग से जुड़ने का संकल्प लें, जो हमारे लिए काम करता है. लिहाजा घर में बर्तन साफ करने वाली, कटिंग करने वाला, कपड़े धोने वाला (पिछड़ा वर्ग), वहीं जूते-चप्पल सुधारने वाले (दलित) से सीधे संपर्क करें, त्योहारों के मौके पर उनके घर जाएं और अपने घर बुलाएं. इसके चलते एक साल में सात से आठ बार आपस में मिलना-जुलना होगा, यही समाज के हित में होगा.”

ये कहता है ब्रिटिश मीडिया

वहीं एक और प्रमुख ब्रिटिश मीडिया कहता है कि संघ प्रमुख किसके लिए कहते हैं और उनकी बातों का असल मतलब क्या होता है, यह संघ से जुड़े लोग ही सही-सही समझ पाते हैं. जब चुनाव को ध्यान में रखते हुए दलितों, पिछड़ों को जोड़ने की बात कही जा रही है तो जाहिर है, डॉ. भीमराव अम्बेडकर का नाम बार-बार लिया जाएगा और लेकिन यह कतई नहीं बताया जाएगा कि डॉ. अम्बेडकर ने हिंदू धर्म क्यों छोड़ा.

यह तो आईने की तरह साफ़ है कि देश के वर्तमान परिदृश्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक अहम् भूमिका है और हो भी क्यों ना, जबकि इस देश के तीन सर्वोच्च पदों पर संघ के स्वयंसेवक पदासीन हैं.

भारतीय जनता पार्टी की शाखाएं अगर देश के चारों कोनों में फ़ैल फूल रही हैं तो इसके पीछे जमीन के भीतर फैली संघ की शाखाएं ही हैं जो आजादी के पहले अपने जन्म से ही आती जाती सांस में एक सपने के साथ जी रही हैं. और उस सपने में देश के उपेक्षित, दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग को मुख्य धारा में लाने की बात हमेशा से ही रही है.

हालांकि यह भी सच है कि गुजरात चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा और संघ से गहरे जुड़े इस बंधन को तोड़ने में कुछ हद तक सफलता हासिल की है और वे इससे उत्साहित भी बहुत हैं. लेकिन हिन्दू समाज को तोड़ने के उनके इरादों को बहुत ज्यादा सफलता मिल पाए, ऐसा लगता नहीं है.

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