इंसानियत की हदें कहीं ख़त्म नहीं होतीं

अभिषेक साहू
जयपुर नेमो लिंक

इंसान सिर्फ इंसान के काम आये, यही इंसानियत की हद नहीं है. वह पशु-पक्षी, पेड़-पौधों, इस दुनिया और बाहर की दुनिया हर जगह हर किसी का ख्याल रख कर अपनी इंसानियत के परचम लहराने को बेताब है.

जयपुर शहर में इंसानियत का यही परचम लहरा रहे हैं रोहित गंगवाल.

इनके परिवार के एक जमा हुआ ज्वेलरी का बिज़नेस है, इनके पास अच्छी सेहत है और खुशहाल परिवार भी. फिर भी मन की जो चाहत थी वो इन्हे पीड़ित पक्षियों तक खींच के ले गई. ये घायल और रोगी पक्षियों का जिस बेहतरीन तरीके से इलाज करते हैं वह शायद देश में कई जगहों पर बेसहारा लोगों को भी नसीब नहीं होता.

आइए जानते हैं कि रोहित गंगवाल कैसे करते हैं इन घायल पक्षियों का इलाज

पक्षियों के लिए अलग से ऑपरेशन थिएटर

मुंबई यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन और NMIMS से पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद रोहित अपने गृह नगर जयपुर लौट आये. लेकिन मन में जो कसक थी वो पढाई और बिज़नेस से पूरी नहीं हो सकी. इन्होने 2005 में अपनी साथियों के साथ मिल कर रक्षा NGO की स्थापना की और फिर कुछ रुपये जोड़कर एक ऑपरेशन थिएटर बनवाया जिसमे पक्षियों की सर्जरी होती है तथा उनके लिए एक अलग से वातानुकूलित रूम भी है. सर्जरी के बाद पक्षियों को उनके बेड (रेहाब बेड) में रखा जाता है साथ ही नुट्रिशन सप्लीमेंट दिया जाता हैं जैसे किसी आम मरीज को दिया जाता है.

जीवन के इस क्षण ने दिए कई पक्षियों को प्राण

बात 2004 की है जब रोहित काम से घर जा रहे थे कि रास्ते में एक पक्षी उनकी नजरों के सामने आ गिरा, जैन होने के कारण वे खून से बहुत डरते थे हिम्मत जुटा कर उसे उठाया और अपनी याददाश्त के अनुसार जितने मंत्र उन्हें याद थे, वे जपने लगे.

वे बताते हैं कि वे काफी घबरा गए उस समय मोबाइल न होने के कारण जितने भी नंबर याद थे वे पीसीओ में जाकर लगाए लेकिन किसी पक्षी को रेस्क्यू करने वाली संस्था तब मौजूद नहीं थी. देखते ही देखते उस पक्षी ने उनके हाथों में ही दम तोड़ दिया. वे ये पल आज तक नहीं भुला नहीं सके हैं.

इसके बाद उन्होंने पक्षियों की मदद करने की ठानी और चार अन्य पक्षियों को रेस्क्यू किया किन्तु पर्याप्त उपचार न मिलने से वे भी मर गए.

बस यहीं से शुरू हुआ उनका सफर. उन्होंने अपने दोस्त हिमांशु और अनुपम के साथ मिलकर खुद उन पक्षियों का इलाज करना शुरू किया और एक कैमरामैन को लेकर पूरे ट्रीटमेंट को रिकॉर्ड किया. ये सारे पक्षी चीनी मांझे से जख्मी हुए थे. बाद में उन्हें डॉक्टरों ने बताया कि चीनी मांझे से लगा घाव सिर्फ सर्जरी से ठीक होता है जो सिर्फ प्रोफेशनल डॉक्टर्स ही करते हैं.

तब वे निकल पड़े अपने दोस्तों के साथ डॉक्टर्स को ढूंढ़ने जिनकी वास्तव में देश में बहुत कम संख्या. लेकिन उन्होंने उन्हें ढूढ़ निकला और उन्हें अपने कैम्प में लेकर आये. फिर कुछ समय बाद उन्होंने रिहैबिलिटेशन सेंटर खोला.

सिर्फ इलाज नहीं, उनको देते हैं पुरानी जिंदगी लौटा कर

रिहैबिलिटेशन या पुनर्वास एक लम्बा प्रोसीजर है, डायग्नोसिस के बाद सर्जरी, फिर बेडरेस्ट, फिर आता है POC (पोस्ट ऑपरेटिव केयर) जिसमे पक्षियों को नुट्रिशन और अन्य दवाईआं दी जाती हैं ताकि घाव भर सके उसके बाद रिहैबिलिटेशन का मुख्या प्रोसीजर स्टार्ट होता है पक्षियों से उनका खाना छिपा दिया जाता हैं ताकि वे स्वयं अपना खाना ढूंढ के खा सके इसका एक और कार्य होता है कि पक्षियों का साइकोलॉजिकल लेवल मेंटेन रखा जा सके. पक्षियों के पुनर्वास की यह प्रक्रिया रोहित ने स्वयं पढ़ कर बनाई है जिससे उन्होंने सैकड़ों पक्षियों में वापस उड़ान भरी है.

लोगो को दिलाई शपथ

रोहित और उनकी टीम ने लोगों को चीनी मांझा को इस्तेमाल करने के नुक्सान से जागरूक कराया तथा उन्होंने सुबह 8 बजे के बाद और शाम 4 बजे से पहले पतंग उड़ाने का समय तय किया क्यूंकि उस समय पक्षियों की आबादी आस्मां में ज़्यादा रहती हैं, जिसको उन्होंने सेहर के कलेक्टर से नोटिफाई करवाया साथ ही उसे न मानने वाले को कानूनन अपराध बनाने की गुहार भी लगायी.

जानवरों का बेहतरीन अस्पताल बनाना चाहते हैं

हालाँकि संस्था के लिए फण्ड इकठ्ठा करना काफी मुश्किल हैं, रोहित बताते हैं कि मनन ठोलिआ उनके सबसे बड़े ट्रस्टी हैं जो की एक वालेंटियर भी हैं. अपने ऐसे और साथियों के साथ रुपये जोड़कर एक जानवरों का अस्पताल बनाना चाहते है जिसकी शुरुआत उन्होंने कर दी हैं. उनकी संस्था अब वर्ल्ड क्लास इक्विपमेंट्स इस्तेमाल करती है हाल ही में एक गैस अनेस्थेसिआ लाया गया लाया गया है जिसकी कीमत एक लाख साठ हज़ार हैं जिसका आधा पैसा दे दिया गया है और आधा बाकी हैं. मेहनत लगन हर कुछ साथ है कमी बस एक पर्याप्त जगह की हैं जिसमे वे एक साथ कई पक्षियों का पुनर्वास कर सके.

अपनी किस्मत को मानते हैं सबसे बड़ी शक्ति

रोहित मानते हैं कि उनकी अच्छी किस्मत ही उनके जीने का कारण हैं. वे सोचते हैं वे ही क्यों और क्यों नहीं जिन्हें ये पुण्य उत्तरदायित्व दिया गया हैं. ये उनकी अच्छी किस्मत ही हैं जिसने उन्हें इतना सपोर्टिव परिवार दिया हैं ये उनकी अच्छी किस्मत ही है जिसने उन्हें बेजुबानों की सेवा करने का मौका दिया हैं.

सपेरों का घर बसाया

रक्षा संस्था पहले पक्षियों के साथ साँपो की भी रक्षा करती थी. पहले वे सपेरो के खिलाफ जाकर उनसे सांपो को छुड़वाती थी किन्तु कुछ समय बाद उन्होंने विचार किया कि वे कितने लोगों की रोज़ी रोटी छीन रहे हैं. उन्होंने तय किया न केवल वे सपेरों को एक अच्छी रोज़ी रोटी का जरिया देंगे बल्कि एक अच्छी रहने की जगह भी मुहैया कराएंगे.

जानवरों को बताया अपना बेस्ट फ्रेंड

बचपन से ही जानवरों से लगाव होने के कारण उन्ही को अपने बचपन के यार दोस्त बताया साथ ही लोगों को ये सन्देश दियां की अपने नज़दीकी घायल जानवर और संस्था में अपना बहुमूल्य समय दे तथा जानवरों की मदद करे.

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