इश्कबाजी करने में ना नेहरू कम थे और ना जिन्ना

नेमो निष्कर्ष

भारत के पहले प्रधानमन्त्री नेहरू और पाकिस्तान के पहले हुक्मरान जिन्ना में भले राज करने के मसले पर अनबन रही हो लेकिन इश्क फरमाने में दोनों एक दूसरे से कम नहीं थे. दोनों ने अपने प्यार के जो सौदे किये उसमे अपने मुनाफे का ध्यान भी रखा.

पंडित नेहरू की लेडी मॉउन्टबेटन से इश्क के चर्चे तो कभी छिपे ही नहीं थे फिर भले इसे ‘अशरीरी प्यार’ या ‘प्लेटोनिक लव’ कह कर छिपाने की कोशिशें की जाती हों. वहीं जिन्ना 20 साल की एक लड़की रति को दिल दे बैठे थे और वह भी अपने दोस्त की बेटी को. बाद में उन्होंने जमाने की खिलाफत सहते हुए उससे शादी भी की.

कहते हैं की साल 1916 की गर्मियों में जिन्ना के मुवक्किल और दोस्त सर दिनशॉ पेतित ने मुंबई की गर्मी से बचने के लिए उन्हें दार्जिलिंग आने की दावत दी. वहीं जिन्ना की मुलाकात सर दिनशॉ की 16 साल की बेटी रती से हुई, जिनका शुमार अपने ज़माने की बंबई की सबसे हसीन लड़कियों में हुआ करता था.

हालाँकि उस समय जिन्ना की उम्र 40 की थी, लेकिन दार्जिलिंग की बर्फ़ से ढकी ख़ामोश चोटियों और रती के बला के हुस्न ने ऐसा समा बाँधा कि वे रति के प्यार में मदहोश हो गए और आखिरकार उसे भी अपने शीशे में उतार ही लिया.

फंसाया अपने ही मुवक्किल को अपने सवाल में

दार्जिलिंग में ही एक बार रात के खाने के बाद जिन्ना ने वकीलों वाले अंदाज में सर दिनशॉ से सवाल किया कि दो धर्मों के बीच शादी के बारे में आप की क्या राय है ?

रती के पिता ने छूटते ही जवाब दिया कि इससे राष्ट्रीय एकता कायम करने में मदद मिलेगी. बस, इसी जवाब पर उन्होंने अपने ही मुवक्किल को फंसा लिया और कहा कि शुरुआत तुम्ही करो इस राष्ट्रीय एकता की.

कहते हैं कि उन्होंने एक लफ़्ज भी ज़ाया न करते हुए अपने पारसी दोस्त दिनशॉ से कहा कि वो उनकी बेटी से शादी करना चाहते हैं.

जिन्ना की इस पेशकश से दिनशॉ गुस्से से पागल हो गए. उन्होंने जिन्ना से उसी वक्त अपना घर छोड़ देने के लिए कहा. जिन्ना ने इस मुद्दे पर पूरी शिद्दत से पैरवी की, लेकिन वो दिनशॉ को मना नहीं सके.

नहीं मानी हार

दो धर्मों के बीच दोस्ती का उनका फ़ॉर्मूला पहले ही परीक्षण में नाकामयाब हो गया. इसके बाद दिनशॉ ने उनसे कभी बात नहीं की और रती पर भी पाबंदी लगा दी कि जब तक वो उनके घर में रह रही हैं, वो जिन्ना से कभी नहीं मिलेंगी.

और तो और उन्होंने अदालत से भी आदेश ले लिया कि जब तक रती वयस्क नहीं हो जातीं, जिन्ना उनसे नहीं मिल सकेंगे.

दो साल तक इंतज़ार

सर दिनशॉ का वास्ता एक ऐसे बैरिस्टर से था जो शायद ही कोई मुक़दमा हारता था. दिनशॉ जितने ज़िद्दी थे, लंबे अर्से से इश्क की जुदाई झेल रहा ये जोड़ा उनसे ज़्यादा ज़िद्दी साबित हुआ. दोनों ने धीरज, ख़ामोशी और शिद्दत से रती के 18 साल के होने का इंतज़ार किया.

जिन्ना के एक और जीवनीकार प्रोफ़ेसर शरीफ़ अल मुजाहिद कहते हैं कि 20 फ़रवरी, 1918 तो जब रती 18 साल की हुईं तो उन्होंने एक छाते और एक जोड़ी कपड़े के साथ अपने पिता का घर छोड़ दिया.

जिन्ना रती को जामिया मस्जिद ले गए जहाँ उन्होंने इस्लाम कबूल किया और 19 अप्रैल, 1918 को जिन्ना और रती का निकाह हो गया.

यहां यह उल्लेख करना जरुरी होगा कि जिन्ना अपनी पहली शादी जवानी के दिनों में ही कर चुके थे और रति उनकी दूसरी बीबी बनी इस्लाम कबूल कर के.

ऐसा था मुनाफे का सौदा

रती जिन्ना पर किताब लिखने वाले ख़्वाजा रज़ी हैदर बीबीसी को दिए इंटरव्यू में कहते हैं कि जिन्ना इंपीरियल लेजेस्लेटिव काउंसिल में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहे थे. अगर वो सिविल मैरेज एक्ट के तहत शादी करते तो उन्हें संभवत: अपनी सीट से इस्तीफ़ा देना पड़ता.

इसलिए उन्होंने इस्लामी तरीके से शादी करने का फ़ैसला किया और रती इसके लिए तैयार भी हो गईं. निकाहनामे में 1001 रुपए का महर तय हुआ, लेकिन जिन्ना ने उपहार के तौर पर रती को एक लाख पच्चीस हज़ार रुपए दिए जो 1918 में बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी. तो इस तरह प्यार भी किया और घाटा भी नहीं होने दिया.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Attention! Don\'t Copy The Content.