मोदी का मौखिक आदेश ऐसे मनवाते हैं शाह

नेमो नेशनल डेस्क

राजनीति में जिस परिवारवाद की खिलाफत प्रधानमंत्री मोदी हमेशा करते आये है भला वही परिवारवाद वे पार्टी के भीतर कैसे बर्दाश्त कर सकते हैं. पार्टी के भीतर इसी परिवारवाद की कमर तोड़ने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने एक मौखिक आदेश दिया हुआ है जिसकी अनुपालना पार्टी अध्यक्ष अमित शाह बड़ी कड़ाई से करवाते हैं.

यह मौखिक नियम बिलकुल सीधा है. वह यह कि अगर बेटा मंत्री बनेगा तो पिता को मंत्री पद से दूर रहना होगा. अगर माता या पिता में से कोई भी मंत्री या मुख्यमंत्री है तो किसी भी सूरत में बेटे या बेटी को प्रदेश या केंद्र सरकार में मंत्री नहीं बनाया जाएगा.

इसलिए गरम हैं सिन्हा

पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा के सामने भी यही प्रश्न रखा गया था कि वह अपने बेटे जयंत सिन्हा को मंत्री बनाएंगे या फिर खुद सांसद बनेंगे. यशवंत ने जयंत सिन्हा को अपने चुनावी हलके हजारीबाग से चुनाव लड़ाया. वह राज्य मंत्री भी बने लेकिन यशवंत सिन्हा को कहीं भी ‘एडजस्ट’ नहीं किया गया. इसके बाद से बड़े सिन्हा बागी हो गए हैं और इसका कुछ नुक्सान जयंत को भी उठाना तो पड़ ही रहा है.

रमन सिंह का भी है यही दर्द

भाजपा के 3 कद्दावर मुख्यमंत्री इस नियम से बेहद परेशान हैं. इनमें छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे शामिल हैं. डा. रमन सिंह अपने बेटे अभिषेक सिंह के लिए लोकसभा का टिकट मांग रहे थे. अभिषेक के सांसद बन जाने के बाद उन्हें केंद्र में राज्यमंत्री बनाने की पैरवी भी की थी लेकिन उनके हाथ निराशा ही लगी.

बेटे की खातिर मोदी से नाराज राजे

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के बीच मनमुटाव की सबसे बड़ी वजह उनके बेटे और सांसद दुष्यंत सिंह का मंत्री नहीं बनना बताया जाता है. भाजपा के मुख्यमंत्री पुत्रों में से दुष्यंत सबसे पुराने सांसद हैं. सूत्रों के मुताबिक उन्होंने राजस्थान की 25 में से 25 सीटें जिताकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने में अपनी अहम भूमिका अदा की लेकिन जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पहली मुलाकात हुई तो दुष्यंत को मंत्री बनाने का सपना टूट गया. उसके बाद से दोनों ही तरफ से थोड़ी असहजता साफ दिखती है.

आडवाणी के सामने भी अड़ गए

गुजरात में भी कुछ ऐसा हुआ जो किसी ने नहीं सोचा था. भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी अब अपनी बेटी प्रतिभा आडवाणी को सियासत में लाना चाहते हैं लेकिन उनके सामने भी वही शर्त है कि आडवाणी को अपनी गांधीनगर की सीट छोडऩी होगी. पिछली बार भी उनके सामने यही विकल्प रखा गया था लेकिन उस वक्त आडवाणी सियासत से रिटायर होने के मूड में नहीं थे इसलिए प्रतिभा का नाम वेटिंग लिस्ट में रखा गया और आडवाणी को कन्फर्म टिकट मिला. अब खबर है कि 2019 के चुनाव में आडवाणी की सीट से प्रतिभा ही चुनाव लड़ेंगी.

ऐसे तरस रहे शिवराज

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी साधना सिंह को सियासत में लाना चाहते हैं लेकिन अभी तक उन्हें चुनाव लडऩे का टिकट नहीं मिल सका. एक ताकतवर महिला केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह की कई बार पैरवी कर चुकी हैं लेकिन उन्हें हर बार मना कर दिया गया. पिछले कुछ समय से शिवराज सिंह चौहान के बेटे भी सियासी मंच पर दिखने लगे हैं लेकिन दिल्ली का रुख एकदम साफ है कि जब तक शिवराज मुख्यमंत्री हैं तब तक उनके परिवार के किसी और सदस्य की सियासत में एंट्री नहीं होगी.

तो यह तो साफ़ है कि मोदी मुखौटे पर कभी विश्वास नहीं करते. यहां तो जो सामने दिख रहा है, वही भीतर भी चल रहा है.

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