जीभ को खुश करने के चक्कर में पेट हुआ बर्बाद

नेमो हेल्थ

कहते हैं कि जब स्वादिष्ट खाना मुंह के अंदर जाता है तो जीभ कहती है ‘वाह’, गला पूछता है ‘क्या’ और पेट कहता है ‘कुछ नहीं’.

लेकिन बेचारे पेट की मुसीबत यह होती है कि जीभ की इस ‘वाह वाह’ में उसकी ‘आहें’ निकलती रहती हैं, उसे पचाते पचाते.

दुनिया में दो ही चीजें सबसे ज्यादा प्राकृतिक हैं, एक है पेट की भूख और दूसरी सेक्स की. लेकिन दोनों तरह की भूख मिटाने के लिए हम विकृति की हद तक जा चुके हैं. बहरहाल, हम यहां पेट और जीभ के बीच की बात कर रहे हैं.

खाना एक बुनियादी ज़रूरत है. इसके लिए इंसान ने क्या-क्या नहीं किया. लड़ाइयां तक लड़ी हैं. एक ज़माना था, जब इंसान के पास खाने के लिए चुनिंदा चीज़ें हुआ करती थीं. लेकिन आज दुनिया भर में इतनी तरह के खाने हैं कि अंदाज़ा तक लगाना मुश्कि़ल है.

इंसान वजूद में आया तो कंद-मूल खाकर गुज़ारा करता था. फिर वो शिकार करने लगा. लेकिन, जैसे-जैसे समझ बढ़ी, उसका खाने का अंदाज़ भी बदला. और इसके साथ ही पूरी मानव जाति हमेशा के लिए बदल गई.

आग की खोज ने इस दिशा में बड़ा रोल निभाया. इंसान ने खाना भून कर खाना शुरू किया.

इंसान के इतिहास में आग के बाद दूसरा अहम क़दम था खेती. पका हुआ खाना पचाना आसान होता था. लिहाज़ा इंसान ने शाकाहारी खाना भी पकाकर खाना शुरू कर दिया. खाने के बदलते मिजाज़ ने इंसान को खेती-बाड़ी करना सिखा दिया.

काश्तकारी के साथ ही इंसान ने आसान खेती के लिए बहुत से औज़ार भी बनाए. हल से खेती करना और आसान हो गया. खेती के साथ ही छोटे-छोटे गांव बसने शुरू हुए. धीरे-धीरे ये गांव क़स्बों में और क़स्बे, शहरों में बदल गए.

देखते ही देखते सभ्यताओं का उदय हुआ. आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी. बढ़ती आबादी के लिए बड़ी मात्रा में खाने की ज़रूरत थी. इसके लिए खाने का व्यापार शुरू हुआ. पका हुआ खाना जब एक जगह से दूसरी जगह जाता था, तो उसके ख़राब होने का डर रहता था.

इस मुश्किल से पार पाने के लिए ऐसे बर्तन बनाए गए, जिनमें खाना लंबे समय तक ठीक रहता था. साथ ही घरों में इस्तेमाल होने वाले रेफ़्रिज़रेटर भी बनने लगे. एक समय था, जब खाना पकाने या गर्म करने के लिए घंटों लगते थे. लेकिन आज माइक्रोवेव चंद मिनट लगाता है.

खाना खाने की आदत बदलने के साथ ही खाना बनाने और उसे रखने के तरीक़े भी बदलने लगे. हरेक फ़सल बारह महीने की नहीं होती. लिहाज़ा जो फल-सब्ज़ी एक मौसम में ख़त्म हो जाते थे, अब उनके लिए दूसरी फ़सल पकने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता.

क्योंकि बहुत से तरीक़े अपना कर खाने-पीने की चीज़ों को संरक्षित कर लिया जाता है. जैसे 1994 में टमाटर को संरक्षित करने के लिए बहुत से तरीक़े इस्तेमाल हुए.

इंसान की खाना खाने की आदत ने इंसानियत को पूरी तरह से बदल डाला है. खाने-पीने की उपलब्धता की वजह से आज इंसान दुनिया के कोने-कोने में बसे हैं. आबादी बढ़ गई है. इंसान बाक़ी क़ुदरत पर राज कर रहे हैं.

लेकिन, इसका भारी नुक़सान भी हुआ है. धरती के माहौल पर भी इसका असर पड़ा है. आज बड़े पैमाने पर खाना बनाने के लिए बहुत तरह की मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है.

इनके इस्तेमाल से ऐसी गैसें निकलती हैं, जो धरती को नुक़सान पहुंचाती हैं. बढ़ती आबादी की ख़ुराक़ पूरी करने के लिए पैदावार बढ़ाई जा रही है. तरह-तरह के केमिकल का इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि फ़सल ख़राब ना हो.

जैसे-जैसे ज़िंदगी आगे बढ़ रही है, इंसान के पास सुकून से खाना खाने का समय तक नहीं रहा. आज उसे हर चीज़ ‘रेडी टू ईट’ चाहिए. इसलिए ऐसा खाना तैयार होने लगा है, जो पेट तो भर देता है लेकिन शरीर को ज़रूरी पोषक तत्व नहीं देता.

पेट की आग बुझाने के लिए तरह-तरह के जतन हो रहे हैं. लेकिन इसके लिए हम वातावरण और ख़ुद अपनी सेहत से खेल रहे हैं. समय आ गया है कि हम खाने के ऐसे विकल्पों के बारे में सोचें, जिनसे हमारी सेहत अच्छी रहे. और क़ुदरत का भी नुक़सान न हो.

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