क्यों नहीं जीने देते राजनेताओं को उनकी निजी जिंदगी

नरेश क्षत्री
नेमो ब्यूरो

राजनीति एक प्रोफेशन है जिसमे राजनेता जनता द्वारा चुन कर आता है जनता की सेवा करने. लेकिन हमारी अतिवादी संस्कृति ने उस प्रोफेशन को एक मिशन का जामा पहना दिया है. और मिशन भी ऐसा कि राजनेता (पुराने जमाने के राजा) बस भगवान् राम की तरह होने चाहिए, या तो एक पत्नीधारी या फिर ब्रम्हचारी. बीच का कुछ भी ना चलेगा, ना दो, ना तीन. भगवान् कृष्ण की बात छोड़ दो, वे योगी थे.

और यह अतिवादी शर्त सिर्फ हिन्दुस्तान में ही नहीं, पूरे एशिया महाद्वीप के नेताओं पर लागू होती है. किसी भी यूरोपीय देश के बारे में यह बात बिलकुल भी नहीं कही जा सकती है. और यही वजह है कि उनका समाज एक अतिवादी नहीं बल्कि एक व्यावहारिक समाज है.

यही वह वजह है जिसने राजनेताओं से उनकी निजी जिंदगी को छीन कर रख लिया है. वह या तो उसे छुप छुप पर जी सकता है या फिर कुचल कर रख दे सारी इंसानी भावनाओं को जिसे उसे प्रकृति ने दी हैं.

इस सोच में बदलाव लाने की शुरुआत भी राजनेताओं को करनी होगी. उन्हें यह बताना और समझाना होगा कि उन्होंने जनता की सेवा करने की जवाबदारी ली है और यह जवाबदारी एक प्रोफेशन है जिसके बाद उनकी अपनी निजी जिंदगी भी है जिसमे किसी को भी कोई तांक झाँक करने का अधिकार नहीं है.

चलिए, इन सारे तथ्यों को भारतीय राजनीति की सन्दर्भ में चल कर देखते हैं.

अब पंडित नेहरू को ही ले लीजिए. तमाम देश में मुंह ज़ुबानी चर्चा होती थी कि इनका लेडी माउंटबेटन के साथ सिलसिला है. फिर एक शारदा माता थीं जिनके बारे में कहा जाता रहा उनकी ज़िंदगी के दौरान भी. उनके मरने के बाद उस पर किताब भी छप गई.

उनसे पहले गांधी के बारे में भी, जो कोई चीज़ छिपाते नहीं थे, उनके एक अनुयायी ने किताब लिखी कि वो ब्रह्मचर्य के अपने प्रयोग के दौरान अपने दोनों तरफ़ युवा लड़कियों को सुलाते थे.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की पूर्व संपादक इंदर मल्होत्रा ने कहा था कि साठ के दशक में गांधी के सेक्स और ब्रह्मचर्य के प्रयोगों पर निर्मल कुमार बोस की किताब छपने से पहले इसके बारे में लोगों को शायद पता भी नहीं था. इससे पहले इस विषय पर लिखने की भी कल्पना नहीं की जा सकती थी.

इंदिरा गांधी के वैवाहिक जीवन पर भी सार्वजनिक रूप से बहुत कम कहा गया है सिवाए इसके कि उनके अपने पति फ़िरोज़ गांधी के साथ संबंध बहुत अच्छे नहीं थे.

इंदर मल्होत्रा ने बीबीसी से एक बातचीत की दौरान खुलकर कहा था कि, “फ़िरोज़ गांधी मेरे बहुत अज़ीज़ दोस्त थे. वो कभी ज़िक्र भी कर देते थे और उनके यहाँ जो महिलाएं आती थीं वो मुझे भी जानती थीं. उनकी दोस्ती हम्मी नाम की एक बहुत ख़ुबसूरत महिला के साथ थी जिनके पिता उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हुआ करते थे. इंदिरा नेहरू की देखभाल के लिए बच्चों को ले कर दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास में आ गईं. वहाँ से फ़िरोज़ का रोमांस शुरू हुआ. फ़िरोज़ हैड अ काइंड ऑफ़ ग्लैड आई.”

राजीव गांधी और सोनिया गांधी के प्रेम प्रसंग पर भी राष्ट्रीय मीडिया में बहुत कम चर्चा हुई है. राशिद किदवई ने ज़रूर सोनिया गांधी पर लिखी जीवनी में इस मुददे पर अपनी नज़र दौड़ाई है.

राजीव के छोटे भाई संजय गांधी का भी नाम कई महिलाओं से जोड़ा गया. उनमें से एक रुख़्साना सुल्ताना भी थीं.

पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेई के ‘परिवार’ पर दबेज़ुबान कुछ चर्चा भले ही होती रही हो लेकिन खुल कर इस पर कभी बात नहीं की गई. वाजपेई ने कॉलेज के दिनों की अपनी दोस्त राज कुमारी कौल के साथ विवाह नहीं किया लेकिन उनकी शादी के बाद उनके पति के घर रहने लगे. उनके किस्से भी बाकियों के किस्सों से थोड़े कम हों.

मुलायम सिंह यादव की दूसरी शादी के बारे में भी लोगों को तब पता चला जब आय से अधिक धन के मामले में मुलायम सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दिया.

वहीं हाल ही में पाकिस्तान की इमरान खान की तीसरी शादी पर पूरे पाकिस्तान के मीडिया ने आसमान सर पर उठा रखा है. वह भी उस देश में और उस मजहब में चार बीबियाँ और तलाक दोनों जायज हैं.

बात वहीं पर आकर रुक जाती है कि आखिर क्यों वे अपनी मनमर्जी से जिंदगी के कुछ पल गुजार सकें. क्यों इतनी अति दर्जे की अपेक्षाएं रखी जाती हैं उनसे कि वे छिपाने पर मजबूर हो जाएँ.

दरअसल यह व्यूह भी इन्ही राजनेताओं का रचा हुआ है और इसे तोडना भी उन्हें ही होगा. अगर वे इसे तोड़ पाते हैं तभी हम एक व्यावहारिक और बेहतर समाज की कल्पना कर पाएंगे.

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